असम ने समान नागरिक संहिता विधेयक 2026 पेश किया - पूर्वोत्तर का पहला और देश का तीसरा राज्य बना
असम सरकार ने 25 मई 2026 को राज्य विधानसभा में समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक पेश किया, जिसमें बहुविवाह पर प्रतिबंध और लिव-इन संबंधों का पंजीकरण अनिवार्य करने का प्रस्ताव है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की ओर से राज्य के संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने विधानसभा में यह विधेयक पेश किया। विधानसभा अध्यक्ष ने इस विधेयक पर 27 मई 2026 को औपचारिक बहस और मतदान निर्धारित किया है।
इसके साथ असम पूर्वोत्तर भारत का पहला और देश का तीसरा BJP-शासित राज्य बन गया है जिसने ऐसा कानून पेश किया है। उत्तराखंड फरवरी 2024 में UCC विधेयक पारित करने वाला पहला राज्य था, इसके बाद गुजरात ने मार्च 2026 में सात घंटे से अधिक की लंबी बहस के बाद बहुमत से यह कानून पारित किया।
समान नागरिक संहिता, असम, 2026 विधेयक विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों से जुड़े मामलों में सभी निवासियों के लिए एकल नागरिक कानूनी ढांचा स्थापित करता है। विधेयक सभी धर्मों के निवासियों के लिए एकल विवाह अनिवार्य करता है और बहुविवाह को भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत दंडनीय बनाता है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने स्पष्ट किया है कि राज्य की अनुसूचित जनजातियों और आदिवासी समुदायों को UCC के दायरे से बाहर रखा जाएगा।
पृष्ठभूमि: समान नागरिक संहिता का अर्थ है एक ऐसा कानून जो सभी भारतीय नागरिकों के लिए - चाहे उनका धर्म कोई भी हो - विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत मामलों को समान रूप से नियंत्रित करे। वर्तमान में विभिन्न धार्मिक समुदायों के व्यक्तिगत मामले अलग-अलग समुदाय-विशिष्ट कानूनों द्वारा संचालित होते हैं। संविधान का अनुच्छेद 44 (भाग IV - नीति निदेशक सिद्धांत) कहता है कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।
BJP ने 2026 असम विधानसभा चुनाव के घोषणापत्र में UCC लागू करने का वादा किया था। राज्य कैबिनेट ने 13 मई 2026 को अपनी पहली बैठक में विधेयक को मंजूरी दी थी। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने 12 मई 2026 को दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। न्यूनतम विवाह आयु, बहुविवाह पर प्रतिबंध, माता-पिता की संपत्ति में बेटियों के समान अधिकार और लिव-इन संबंध - ये चार मुख्य विषय असम UCC के अंतर्गत शामिल हैं।
खबर में क्यों: असम UCC विधेयक 2026 प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए राजनीति और शासन की सबसे महत्वपूर्ण खबरों में से एक है क्योंकि यह सीधे संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 44), व्यक्तिगत कानूनों पर राष्ट्रीय बहस और एक बड़े राज्य-स्तरीय विधायी घटनाक्रम से जुड़ी है। UPSC, SSC CGL और बैंकिंग परीक्षाओं में UCC को शासित करने वाला अनुच्छेद, इसे लागू करने वाले राज्य, उनका क्रम, असम विधेयक के प्रावधान, जनजातीय छूट और विधेयक पेश करने वाले व्यक्ति पर प्रश्न आ सकते हैं।
याद रखने योग्य बिंदु:
- असम ने 25 मई 2026 को राज्य विधानसभा में समान नागरिक संहिता विधेयक 2026 पेश किया
- विधेयक पेश किया: संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने, CM हिमंत बिस्वा सरमा की ओर से
- असम पूर्वोत्तर भारत का पहला और देश का तीसरा BJP-शासित राज्य जिसने UCC पेश किया
- विधेयक पर बहस और पारित होने की तिथि: 27 मई 2026
- UCC पारित करने वाला पहला राज्य: उत्तराखंड (फरवरी 2024)
- दूसरा राज्य: गुजरात (मार्च 2026)
- 4 मुख्य विषय: न्यूनतम विवाह आयु, बहुविवाह पर प्रतिबंध, बेटियों को संपत्ति में समान अधिकार, लिव-इन संबंध पंजीकरण
- बहुविवाह को भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत दंडनीय बनाया गया
- असम की अनुसूचित जनजातियां और आदिवासी समुदाय UCC से EXEMPT (छूट प्राप्त) हैं
- UCC संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत नीति निदेशक सिद्धांत है
- विधेयक नव-निर्वाचित CM सरमा के दूसरे कार्यकाल की पहली विधानसभा सत्र में पेश हुआ
- असम CM: हिमंत बिस्वा सरमा (BJP); 12 मई 2026 को दूसरी बार शपथ ली
संबंधित स्टेटिक GK:
- अनुच्छेद 44: नीति निदेशक सिद्धांत - सभी नागरिकों के लिए UCC का प्रावधान
- संविधान का भाग IV: नीति निदेशक सिद्धांत (अनुच्छेद 36-51)
- नीति निदेशक सिद्धांत न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं हैं, किंतु शासन के लिए मौलिक हैं
- 21वें विधि आयोग (2023) ने राष्ट्रीय स्तर पर UCC के खिलाफ सिफारिश की - मौजूदा कानूनों में सुधार का सुझाव दिया
- भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की जगह 1 जुलाई 2024 से ली
- उत्तराखंड UCC अधिनियम 2024: स्वतंत्रता के बाद किसी भारतीय राज्य का पहला UCC
- सर्वोच्च न्यायालय ने शाह बानो मामले (1985) में UCC की सिफारिश की थी
- असम की राजधानी: दिसपुर; सबसे बड़ा शहर: गुवाहाटी
- असम के राज्यपाल (2026): लक्ष्मण प्रसाद आचार्य
- प्रमुख वर्तमान व्यक्तिगत कानून: हिंदू विवाह अधिनियम (1955), हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956), मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम (1937)